Kalam Ki Syaa'h Sookh Chali Ab Darya-e- Ek Patrakar Ke Mukh Se: April 2014

Wednesday, 9 April 2014

क़लम  की  श्याह अब सूख चली है अलि  
खुद आप ही आब-ए-कौशर का रुख कर, 
चिराग मंद पड़ गये दूर करे न अँधेरा 
गुल गमगीन हैं सुगंध भी समेटे है कली 

पतझड़ की ये बयार है उड़ाती सूखे पत्ते
बनी ठूँठ तरु तो तृष्णा से तड़प और बढ़ी
हर पल शुक्ष्म सद्रिश, प्रतीत हो हर घड़ी
मन मर गया विचार बिसर दी तिलांजलि

दिन रात रातदिन हए, न रहे वो दो पहर
इक ओर से शुरू, तो न ख़त्म वो हुए
ढेर हो गईं रेत टीलें सब्र टूट गए
अब कटे कैसे सब, होते न जो सहर

बोझ दिल पे लिए, किस लिए
क्यूँ पथरा दीं ये निगाहें
बस उँगलियों पे नाचते
तोड़ क्यों न देते ये सलाखें

कदम रोके हो सच से मुख हरदम मोड़ लेते हो
किस बात की कोशिश, कैसी ये कशिश
तुम हर बार यही सोच लेते हो
व्यर्थ हर विद्रोह है, समय ही है बली
क़लम  की श्याह अब सूख चली है अलि II